Godaan (Hindi)
Paperback
• 432 Pages
• Rs 299.00
• Hindi
• 9789388810470
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| Publisher | Fingerprint! Publishing |
|---|---|
| ISBN13 | 9789388810470 |
| ASIN/SKU | 9388810473 |
| Book Format | Paperback |
| Language | Hindi |
| Pages | 432 |
| List Price | Rs 299.00 |
| Book Code | BD00054954 |
Discover Godaan (Hindi) by Premchand. This book is published by Fingerprint! Publishing in Paperback format, ISBN 9789388810470, ASIN 9388810473, under Literature and Fiction, Indian Writing, Hindi Literature.
Book Description
Godaan is a masterpiece of Indian literature that explores the complex themes of social inequality, rural life, and the struggles of the marginalized. Written by Munshi Premchand, this timeless novel takes you on a poignant journey through the lives of characters grappling with poverty, morality, and the pursuit of a better life.
Compelling storytelling that immerses you in the vibrant world of rural India.
Thought-provoking social commentary that sheds light on caste dynamics and societal injustices.
Memorable characters whose stories evoke empathy and reflection.
A powerful portrayal of the human condition and the search for meaning.
A must-read for those interested in Indian literature and a deeper understanding of society.
Compelling storytelling that immerses you in the vibrant world of rural India.
Thought-provoking social commentary that sheds light on caste dynamics and societal injustices.
Memorable characters whose stories evoke empathy and reflection.
A powerful portrayal of the human condition and the search for meaning.
A must-read for those interested in Indian literature and a deeper understanding of society.
Author Biography
मुंशी प्रेमचंद को हिंदी साहित्य का 'उपन्यास सम्राट' कहा जाता है। उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी के निकट लमही नामक गाँव में हुआ था। प्रेमचंद का असली नाम 'धनपत राय श्रीवास्तव' था। उनका बचपन काफी संघर्षपूर्ण रहा; बहुत छोटी उम्र में ही उन्होंने अपनी माता और फिर पिता को खो दिया था। जीवन की इन तमाम कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और बाद में शिक्षा विभाग में एक शिक्षक के रूप में काम करना शुरू किया।
प्रेमचंद ने अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत उर्दू भाषा से की थी, जहाँ वे 'नवाब राय' के नाम से लिखते थे। ब्रिटिश सरकार द्वारा उनकी पहली कहानी संग्रह 'सोजे-वतन' को जब्त किए जाने के बाद, वे हिंदी में लिखने लगे और अपना नाम बदलकर 'प्रेमचंद' रख लिया। उनकी कहानियों और उपन्यासों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी यथार्थवादिता है। प्रेमचंद ने कल्पना की दुनिया से बाहर निकलकर आम आदमी, गरीब किसानों, मजदूरों और समाज के शोषित वर्गों की वास्तविक समस्याओं को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। उन्होंने अपनी कलम के माध्यम से गरीबी, जमींदारी प्रथा, छुआछूत और भ्रष्टाचार जैसी सामाजिक बुराइयों पर गहरी चोट की।
प्रेमचंद ने अपने जीवनकाल में 15 उपन्यास और लगभग 300 से अधिक कहानियाँ लिखीं, जिन्हें 'मानसरोवर' के कई भागों में संकलित किया गया है। उनके प्रमुख उपन्यासों में 'गोदान', 'गबन', 'कर्मभूमि', 'रंगभूमि' और 'निर्मला' शामिल हैं। वहीं कहानियों में 'ईदगाह', 'कफन', 'नमक का दरोगा', 'पंच परमेश्वर' और 'पूस की रात' आज भी लोगों के दिलों में बसी हैं। 'गोदान' को हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में से एक माना जाता है।
8 अक्टूबर 1936 को बीमारी के कारण मुंशी प्रेमचंद का निधन हो गया। उनका अपना जीवन भले ही आर्थिक तंगी और संघर्षों में बीता, लेकिन उन्होंने हिंदी और उर्दू साहित्य को जो अनमोल खजाना दिया, वह बेमिसाल है। प्रेमचंद की सरल, सहज और आम बोलचाल की भाषा ने उन्हें हमेशा के लिए जनमानस का सबसे प्रिय लेखक बना दिया है। उनकी रचनाएं आज के समाज में भी पूरी तरह से प्रासंगिक हैं।
प्रेमचंद ने अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत उर्दू भाषा से की थी, जहाँ वे 'नवाब राय' के नाम से लिखते थे। ब्रिटिश सरकार द्वारा उनकी पहली कहानी संग्रह 'सोजे-वतन' को जब्त किए जाने के बाद, वे हिंदी में लिखने लगे और अपना नाम बदलकर 'प्रेमचंद' रख लिया। उनकी कहानियों और उपन्यासों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी यथार्थवादिता है। प्रेमचंद ने कल्पना की दुनिया से बाहर निकलकर आम आदमी, गरीब किसानों, मजदूरों और समाज के शोषित वर्गों की वास्तविक समस्याओं को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। उन्होंने अपनी कलम के माध्यम से गरीबी, जमींदारी प्रथा, छुआछूत और भ्रष्टाचार जैसी सामाजिक बुराइयों पर गहरी चोट की।
प्रेमचंद ने अपने जीवनकाल में 15 उपन्यास और लगभग 300 से अधिक कहानियाँ लिखीं, जिन्हें 'मानसरोवर' के कई भागों में संकलित किया गया है। उनके प्रमुख उपन्यासों में 'गोदान', 'गबन', 'कर्मभूमि', 'रंगभूमि' और 'निर्मला' शामिल हैं। वहीं कहानियों में 'ईदगाह', 'कफन', 'नमक का दरोगा', 'पंच परमेश्वर' और 'पूस की रात' आज भी लोगों के दिलों में बसी हैं। 'गोदान' को हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में से एक माना जाता है।
8 अक्टूबर 1936 को बीमारी के कारण मुंशी प्रेमचंद का निधन हो गया। उनका अपना जीवन भले ही आर्थिक तंगी और संघर्षों में बीता, लेकिन उन्होंने हिंदी और उर्दू साहित्य को जो अनमोल खजाना दिया, वह बेमिसाल है। प्रेमचंद की सरल, सहज और आम बोलचाल की भाषा ने उन्हें हमेशा के लिए जनमानस का सबसे प्रिय लेखक बना दिया है। उनकी रचनाएं आज के समाज में भी पूरी तरह से प्रासंगिक हैं।
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Book Summary
'गोदान' उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद का सबसे प्रसिद्ध, अंतिम और सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है। इसका प्रकाशन वर्ष 1936 में हुआ था। यह उपन्यास भारतीय ग्रामीण जीवन, कृषक समाज और उनके ऊपर होने वाले चौतरफा शोषण का एक अत्यंत सजीव और यथार्थवादी दस्तावेज़ है। प्रेमचंद ने इस महान कृति के माध्यम से तत्कालीन भारतीय समाज की कड़वी सच्चाइयों को बहुत ही सहजता और गहराई से उजागर किया है। यह कहानी मुख्य रूप से एक अत्यंत गरीब, सीधे-साधे और धार्मिक प्रवृत्ति के किसान होरी और उसके परिवार के कठिन संघर्षों के इर्द-गिर्द घूमती है। इसके साथ ही, प्रेमचंद ने शहरी जीवन और जमींदारी व्यवस्था के खोखलेपन को भी समानांतर रूप से दिखाया है।
उपन्यास की शुरुआत होरी के जीवन की एक बहुत ही साधारण लेकिन गहरी इच्छा से होती है। होरी बेलारी गाँव का एक साधारण किसान है। उसके पास थोड़ी सी जमीन है, जिस पर वह खेती करता है। उसके मन में लंबे समय से एक इच्छा दबी हुई है कि उसके घर के दरवाजे पर भी एक गाय बंधी हो। भारतीय ग्रामीण समाज में दरवाजे पर गाय का होना समृद्धि, प्रतिष्ठा और धार्मिक पुण्य का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही, हिंदू मान्यताओं के अनुसार मृत्यु के समय वैतरणी नदी पार करने के लिए 'गोदान' यानी गाय का दान करना आवश्यक माना जाता है। होरी अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए तरसता रहता है। एक दिन वह अपने परिचित भोला अहीर से बात करता है और बहुत मिन्नतें करने के बाद उधार पर एक सुंदर गाय अपने घर ले आता है।
गाय के आने से होरी के पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ जाती है। उसकी पत्नी धनिया, बेटा गोबर और बेटियां सोना तथा रूपा सभी बहुत प्रसन्न होते हैं। लेकिन यह खुशी उनके जीवन में बहुत कम समय के लिए आती है। होरी का छोटा भाई हीरा स्वभाव से ईर्ष्यालु और क्रूर है। उसे होरी की यह तरक्की बर्दाश्त नहीं होती। एक रात वह चुपके से आता है और होरी की गाय को जहर दे देता है। जहर के कारण गाय की दर्दनाक मौत हो जाती है। इस घटना से पूरा परिवार सदमे में आ जाता है। जब पुलिस इस मामले की जांच करने के लिए गाँव आती है, तो होरी का पारंपरिक और मर्यादावादी स्वभाव सामने आता है। वह नहीं चाहता कि उसके भाई को पुलिस पकड़े और परिवार की बदनामी हो। इसलिए वह पुलिस को रिश्वत देकर मामले को रफा-दफा करने का प्रयास करता है। इस रिश्वत के पैसे जुटाने के लिए होरी को भारी ब्याज पर कर्ज लेना पड़ता है। यहीं से उसके जीवन में दुखों का ऐसा अंतहीन सिलसिला शुरू होता है जो उसे कभी उबरने नहीं देता।
इसी बीच कहानी में एक और बड़ा मोड़ आता है। होरी का जवान बेटा गोबर अक्सर भोला के घर दूध लेने जाता है। वहाँ उसे भोला की विधवा बेटी झुनिया से प्रेम हो जाता है। कुछ समय बाद झुनिया गर्भवती हो जाती है। समाज और बिरादरी के डर से गोबर घबरा जाता है। वह झुनिया को आधी रात को होरी के घर के बाहर छोड़ देता है और खुद चुपचाप काम की तलाश में शहर यानी लखनऊ भाग जाता है। होरी और उसकी पत्नी धनिया के सामने अब एक बहुत बड़ी धर्मसंकट की स्थिति पैदा हो जाती है। समाज के कड़े नियमों के अनुसार एक कुंवारी या विधवा गर्भवती लड़की को घर में रखना बहुत बड़ा पाप माना जाता था। धनिया स्वभाव से बहुत स्वाभिमानी और न्यायप्रिय महिला है। वह समाज की परवाह न करते हुए झुनिया को अपने घर में शरण देती है। होरी भी अपनी नैतिकता के कारण झुनिया को स्वीकार कर लेता है।
लेकिन गाँव के रूढ़िवादी समाज को यह बात बिल्कुल मंजूर नहीं होती। गाँव के ठेकेदार, पंडित दातादीन, पटवारी नोखेराम और साहूकार झिंगुरी सिंह मिलकर एक पंचायत बुलाते हैं। पंचायत में होरी के परिवार पर बिरादरी को कलंकित करने का आरोप लगाया जाता है। सजा के तौर पर होरी पर भारी जुर्माना यानी 'डांड' लगाया जाता है। इस जुर्माने को भरने के लिए होरी के पास कोई नकद पैसा नहीं होता। समाज के दवाब में आकर उसे अपने घर का बचा-कुचा अनाज, बर्तन और यहाँ तक कि अपनी जमीन का एक बड़ा हिस्सा भी बेचना पड़ता है। इस प्रकार, एक सामाजिक अपराध की आड़ में गाँव के ऊंचे और प्रभावशाली लोग मिलकर एक गरीब किसान को पूरी तरह से कंगाल कर देते हैं। होरी अब पूरी तरह से कर्ज के दलदल में धंस जाता है।
प्रेमचंद ने इस ग्रामीण कहानी के समानांतर शहरी जीवन को भी बखूबी चित्रित किया है। शहर की कहानी में राय साहब अमरपाल सिंह हैं, जो बेलारी गाँव के जमींदार हैं। वह दिखने में बहुत पढ़े-लिखे, सभ्य और राष्ट्रवादी विचारों के व्यक्ति हैं। वे अक्सर किसानों की दयनीय स्थिति पर दुख भी जताते हैं, लेकिन असल जिंदगी में वे अपने ऐशो-आराम और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किसानों का बेरहमी से शोषण करते हैं। शहर के अन्य पात्रों में मिस्टर खन्ना हैं, जो एक मिल मालिक और बैंक मैनेजर हैं। मिस मालती एक आधुनिक, स्वतंत्र और पढ़ी-लिखी महिला डॉक्टर हैं, और डॉ. मेहता विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर हैं। डॉ. मेहता एक सुलझे हुए और संवेदनशील व्यक्ति हैं, जो बाद में मिस मालती के विचारों में बदलाव लाते हैं। शहरी समाज के इन पात्रों के माध्यम से प्रेमचंद ने आधुनिक सभ्यता के खोखलेपन, स्वार्थ, चालाकी और पूंजीवाद के क्रूर चेहरे को बेनकाब किया है।
उधर शहर भागकर गया गोबर लखनऊ की एक मिल में मजदूरी करने लगता है। शहर की हवा लगने के बाद उसके विचारों में बड़ा बदलाव आता है। वह समझ जाता है कि अमीर लोग किस तरह गरीबों का खून चूसते हैं। वह पैसा कमाने के बाद अपनी पत्नी झुनिया और बच्चे को भी शहर बुला लेता है। कुछ समय बाद गोबर जब वापस अपने गाँव लौटता है, तो वह एक बदला हुआ व्यक्ति होता है। वह अब गाँव के शोषकों और बिरादरी के ठेकेदारों से डरता नहीं है। वह उनके खिलाफ आवाज उठाता है और होरी को भी समझाता है कि उसे इस तरह चुपचाप अन्याय नहीं सहना चाहिए। लेकिन होरी पुरानी मान्यताओं और मर्यादाओं से बंधा हुआ है। उसे लगता है कि बड़ों का विरोध करना और समाज के नियमों को तोड़ना पाप है। इस वजह से पिता और पुत्र के बीच वैचारिक मतभेद पैदा हो जाते हैं और गोबर फिर से शहर लौट जाता है।
गाँव में होरी की स्थिति दिन-ब-दिन और भी बदतर होती चली जाती है। कर्ज का ब्याज लगातार बढ़ता रहता है। महाजन और साहूकार सुबह-शाम उसके दरवाजे पर आकर उसे गालियां देते हैं और प्रताड़ित करते हैं। होरी के पास अब अपनी बेटियों, सोना और रूपा, के विवाह के लिए भी पैसे नहीं होते। वह मजबूरी में अपनी छोटी बेटी रूपा का विवाह एक बहुत बड़ी उम्र के अमीर आदमी से कर देता है, ताकि कुछ पैसे मिल सकें और वह अपना कर्ज चुका सके। यह घटना होरी के स्वाभिमान पर सबसे करारी चोट होती है। वह अंदर से पूरी तरह टूट जाता है, लेकिन फिर भी वह अपनी किस्मत को दोष देकर शांत रहता है। उसकी जमीन अब उसके हाथ से निकल चुकी है और वह अपने ही गाँव में एक साधारण खेतिहर मजदूर बन चुका है।
होरी दिन-रात बिना थके, भूखे-प्यासे कड़ी मेहनत करता है। वह बांस काटने, पत्थर ढोने और खेतों में मजदूरी करने का काम करता है ताकि किसी तरह हर महाजन का पैसा चुकाया जा सके। अत्यधिक श्रम, चिंता और उचित भोजन न मिलने के कारण उसका शरीर जर्जर हो जाता है। वह समय से पहले ही बूढ़ा और कमजोर दिखने लगता है। धनिया उसे बार-बार आराम करने के लिए कहती है, लेकिन होरी जानता है कि यदि वह रुक गया, तो उसका परिवार सड़क पर आ जाएगा। उसके भीतर केवल एक ही धुन सवार रहती है कि मरते दम तक वह किसी का कर्जदार न रहे।
उपन्यास का अंत अत्यंत कारुणिक और हृदयविदारक है। जेठ की तपती हुई दोपहरी में होरी सड़क पर मजदूरी कर रहा होता है। अचानक अत्यधिक गर्मी और कमजोरी के कारण उसे लू लग जाती है। वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ता है। अन्य मजदूर उसे उठाकर उसके घर लाते हैं। धनिया दौड़कर आती है और उसकी देखरेख करती है, लेकिन होरी की हालत लगातार बिगड़ती जाती है। उसकी आँखें पथराने लगती हैं। अपनी अंतिम घड़ियों में भी होरी होश खोते हुए धनिया से कहता है कि उसका इस जन्म का सफर अब समाप्त हो रहा है और उसे इस बात का दुख है कि वह धनिया को कोई सुख नहीं दे पाया।
तभी गाँव का पंडित दातादीन वहाँ पहुँचता है। वह होरी की मरणासन्न स्थिति को देखकर भी अपनी धार्मिक क्रूरता नहीं छोड़ता। वह धनिया से कहता है कि होरी के प्राण अटके हुए हैं, इसलिए इसकी आत्मा की सद्गति के लिए तुरंत 'गोदान' करवाओ। गोदान के बिना इसकी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। धनिया के पास उस समय घर में एक दाना भी अनाज नहीं था और न ही कोई गाय थी। वह पूरी तरह बेबस और असहाय थी। वह रोते हुए अंदर जाती है और अपनी जिंदगी भर की कुल बचत, जो मात्र बीस आने यानी सवा रुपया थी, लेकर बाहर आती है। वह कांपते हाथों से उन पैसों को दातादीन के चरणों में रख देती है। धनिया अत्यंत करुण स्वर में कहती है कि महाराज, घर में न तो कोई गाय है और न ही पैसे हैं, यही इनका गोदान है। यह कहते ही धनिया फूट-फूट कर रोने लगती है और होरी के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं।
इस प्रकार प्रेमचंद का यह उपन्यास होरी की मृत्यु के साथ समाप्त होता है। 'गोदान' केवल होरी और धनिया की व्यक्तिगत कहानी नहीं है, बल्कि यह तत्कालीन भारत के करोड़ों मूक और असहाय किसानों की वास्तविक सामूहिक गाथा है। प्रेमचंद ने बहुत ही सरल, स्पष्ट और मर्मस्पर्शी वाक्यों के माध्यम से यह दिखाया है कि किस प्रकार सामाजिक कुरीतियां, कर्ज का चक्र, धार्मिक पाखंड और जमींदारी व्यवस्था मिलकर एक सच्चे, ईमानदार और मेहनती इंसान का जीवन पूरी तरह नष्ट कर देते हैं। होरी का चरित्र पूरी दुनिया के साहित्य में शोषित किसान वर्ग का एक अमर और कालजयी प्रतीक बन गया है। यह उपन्यास समाज को उसकी क्रूरता का आईना दिखाता है और पाठकों के दिलों में एक गहरी संवेदना छोड़ जाता है।
उपन्यास की शुरुआत होरी के जीवन की एक बहुत ही साधारण लेकिन गहरी इच्छा से होती है। होरी बेलारी गाँव का एक साधारण किसान है। उसके पास थोड़ी सी जमीन है, जिस पर वह खेती करता है। उसके मन में लंबे समय से एक इच्छा दबी हुई है कि उसके घर के दरवाजे पर भी एक गाय बंधी हो। भारतीय ग्रामीण समाज में दरवाजे पर गाय का होना समृद्धि, प्रतिष्ठा और धार्मिक पुण्य का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही, हिंदू मान्यताओं के अनुसार मृत्यु के समय वैतरणी नदी पार करने के लिए 'गोदान' यानी गाय का दान करना आवश्यक माना जाता है। होरी अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए तरसता रहता है। एक दिन वह अपने परिचित भोला अहीर से बात करता है और बहुत मिन्नतें करने के बाद उधार पर एक सुंदर गाय अपने घर ले आता है।
गाय के आने से होरी के पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ जाती है। उसकी पत्नी धनिया, बेटा गोबर और बेटियां सोना तथा रूपा सभी बहुत प्रसन्न होते हैं। लेकिन यह खुशी उनके जीवन में बहुत कम समय के लिए आती है। होरी का छोटा भाई हीरा स्वभाव से ईर्ष्यालु और क्रूर है। उसे होरी की यह तरक्की बर्दाश्त नहीं होती। एक रात वह चुपके से आता है और होरी की गाय को जहर दे देता है। जहर के कारण गाय की दर्दनाक मौत हो जाती है। इस घटना से पूरा परिवार सदमे में आ जाता है। जब पुलिस इस मामले की जांच करने के लिए गाँव आती है, तो होरी का पारंपरिक और मर्यादावादी स्वभाव सामने आता है। वह नहीं चाहता कि उसके भाई को पुलिस पकड़े और परिवार की बदनामी हो। इसलिए वह पुलिस को रिश्वत देकर मामले को रफा-दफा करने का प्रयास करता है। इस रिश्वत के पैसे जुटाने के लिए होरी को भारी ब्याज पर कर्ज लेना पड़ता है। यहीं से उसके जीवन में दुखों का ऐसा अंतहीन सिलसिला शुरू होता है जो उसे कभी उबरने नहीं देता।
इसी बीच कहानी में एक और बड़ा मोड़ आता है। होरी का जवान बेटा गोबर अक्सर भोला के घर दूध लेने जाता है। वहाँ उसे भोला की विधवा बेटी झुनिया से प्रेम हो जाता है। कुछ समय बाद झुनिया गर्भवती हो जाती है। समाज और बिरादरी के डर से गोबर घबरा जाता है। वह झुनिया को आधी रात को होरी के घर के बाहर छोड़ देता है और खुद चुपचाप काम की तलाश में शहर यानी लखनऊ भाग जाता है। होरी और उसकी पत्नी धनिया के सामने अब एक बहुत बड़ी धर्मसंकट की स्थिति पैदा हो जाती है। समाज के कड़े नियमों के अनुसार एक कुंवारी या विधवा गर्भवती लड़की को घर में रखना बहुत बड़ा पाप माना जाता था। धनिया स्वभाव से बहुत स्वाभिमानी और न्यायप्रिय महिला है। वह समाज की परवाह न करते हुए झुनिया को अपने घर में शरण देती है। होरी भी अपनी नैतिकता के कारण झुनिया को स्वीकार कर लेता है।
लेकिन गाँव के रूढ़िवादी समाज को यह बात बिल्कुल मंजूर नहीं होती। गाँव के ठेकेदार, पंडित दातादीन, पटवारी नोखेराम और साहूकार झिंगुरी सिंह मिलकर एक पंचायत बुलाते हैं। पंचायत में होरी के परिवार पर बिरादरी को कलंकित करने का आरोप लगाया जाता है। सजा के तौर पर होरी पर भारी जुर्माना यानी 'डांड' लगाया जाता है। इस जुर्माने को भरने के लिए होरी के पास कोई नकद पैसा नहीं होता। समाज के दवाब में आकर उसे अपने घर का बचा-कुचा अनाज, बर्तन और यहाँ तक कि अपनी जमीन का एक बड़ा हिस्सा भी बेचना पड़ता है। इस प्रकार, एक सामाजिक अपराध की आड़ में गाँव के ऊंचे और प्रभावशाली लोग मिलकर एक गरीब किसान को पूरी तरह से कंगाल कर देते हैं। होरी अब पूरी तरह से कर्ज के दलदल में धंस जाता है।
प्रेमचंद ने इस ग्रामीण कहानी के समानांतर शहरी जीवन को भी बखूबी चित्रित किया है। शहर की कहानी में राय साहब अमरपाल सिंह हैं, जो बेलारी गाँव के जमींदार हैं। वह दिखने में बहुत पढ़े-लिखे, सभ्य और राष्ट्रवादी विचारों के व्यक्ति हैं। वे अक्सर किसानों की दयनीय स्थिति पर दुख भी जताते हैं, लेकिन असल जिंदगी में वे अपने ऐशो-आराम और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किसानों का बेरहमी से शोषण करते हैं। शहर के अन्य पात्रों में मिस्टर खन्ना हैं, जो एक मिल मालिक और बैंक मैनेजर हैं। मिस मालती एक आधुनिक, स्वतंत्र और पढ़ी-लिखी महिला डॉक्टर हैं, और डॉ. मेहता विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर हैं। डॉ. मेहता एक सुलझे हुए और संवेदनशील व्यक्ति हैं, जो बाद में मिस मालती के विचारों में बदलाव लाते हैं। शहरी समाज के इन पात्रों के माध्यम से प्रेमचंद ने आधुनिक सभ्यता के खोखलेपन, स्वार्थ, चालाकी और पूंजीवाद के क्रूर चेहरे को बेनकाब किया है।
उधर शहर भागकर गया गोबर लखनऊ की एक मिल में मजदूरी करने लगता है। शहर की हवा लगने के बाद उसके विचारों में बड़ा बदलाव आता है। वह समझ जाता है कि अमीर लोग किस तरह गरीबों का खून चूसते हैं। वह पैसा कमाने के बाद अपनी पत्नी झुनिया और बच्चे को भी शहर बुला लेता है। कुछ समय बाद गोबर जब वापस अपने गाँव लौटता है, तो वह एक बदला हुआ व्यक्ति होता है। वह अब गाँव के शोषकों और बिरादरी के ठेकेदारों से डरता नहीं है। वह उनके खिलाफ आवाज उठाता है और होरी को भी समझाता है कि उसे इस तरह चुपचाप अन्याय नहीं सहना चाहिए। लेकिन होरी पुरानी मान्यताओं और मर्यादाओं से बंधा हुआ है। उसे लगता है कि बड़ों का विरोध करना और समाज के नियमों को तोड़ना पाप है। इस वजह से पिता और पुत्र के बीच वैचारिक मतभेद पैदा हो जाते हैं और गोबर फिर से शहर लौट जाता है।
गाँव में होरी की स्थिति दिन-ब-दिन और भी बदतर होती चली जाती है। कर्ज का ब्याज लगातार बढ़ता रहता है। महाजन और साहूकार सुबह-शाम उसके दरवाजे पर आकर उसे गालियां देते हैं और प्रताड़ित करते हैं। होरी के पास अब अपनी बेटियों, सोना और रूपा, के विवाह के लिए भी पैसे नहीं होते। वह मजबूरी में अपनी छोटी बेटी रूपा का विवाह एक बहुत बड़ी उम्र के अमीर आदमी से कर देता है, ताकि कुछ पैसे मिल सकें और वह अपना कर्ज चुका सके। यह घटना होरी के स्वाभिमान पर सबसे करारी चोट होती है। वह अंदर से पूरी तरह टूट जाता है, लेकिन फिर भी वह अपनी किस्मत को दोष देकर शांत रहता है। उसकी जमीन अब उसके हाथ से निकल चुकी है और वह अपने ही गाँव में एक साधारण खेतिहर मजदूर बन चुका है।
होरी दिन-रात बिना थके, भूखे-प्यासे कड़ी मेहनत करता है। वह बांस काटने, पत्थर ढोने और खेतों में मजदूरी करने का काम करता है ताकि किसी तरह हर महाजन का पैसा चुकाया जा सके। अत्यधिक श्रम, चिंता और उचित भोजन न मिलने के कारण उसका शरीर जर्जर हो जाता है। वह समय से पहले ही बूढ़ा और कमजोर दिखने लगता है। धनिया उसे बार-बार आराम करने के लिए कहती है, लेकिन होरी जानता है कि यदि वह रुक गया, तो उसका परिवार सड़क पर आ जाएगा। उसके भीतर केवल एक ही धुन सवार रहती है कि मरते दम तक वह किसी का कर्जदार न रहे।
उपन्यास का अंत अत्यंत कारुणिक और हृदयविदारक है। जेठ की तपती हुई दोपहरी में होरी सड़क पर मजदूरी कर रहा होता है। अचानक अत्यधिक गर्मी और कमजोरी के कारण उसे लू लग जाती है। वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ता है। अन्य मजदूर उसे उठाकर उसके घर लाते हैं। धनिया दौड़कर आती है और उसकी देखरेख करती है, लेकिन होरी की हालत लगातार बिगड़ती जाती है। उसकी आँखें पथराने लगती हैं। अपनी अंतिम घड़ियों में भी होरी होश खोते हुए धनिया से कहता है कि उसका इस जन्म का सफर अब समाप्त हो रहा है और उसे इस बात का दुख है कि वह धनिया को कोई सुख नहीं दे पाया।
तभी गाँव का पंडित दातादीन वहाँ पहुँचता है। वह होरी की मरणासन्न स्थिति को देखकर भी अपनी धार्मिक क्रूरता नहीं छोड़ता। वह धनिया से कहता है कि होरी के प्राण अटके हुए हैं, इसलिए इसकी आत्मा की सद्गति के लिए तुरंत 'गोदान' करवाओ। गोदान के बिना इसकी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। धनिया के पास उस समय घर में एक दाना भी अनाज नहीं था और न ही कोई गाय थी। वह पूरी तरह बेबस और असहाय थी। वह रोते हुए अंदर जाती है और अपनी जिंदगी भर की कुल बचत, जो मात्र बीस आने यानी सवा रुपया थी, लेकर बाहर आती है। वह कांपते हाथों से उन पैसों को दातादीन के चरणों में रख देती है। धनिया अत्यंत करुण स्वर में कहती है कि महाराज, घर में न तो कोई गाय है और न ही पैसे हैं, यही इनका गोदान है। यह कहते ही धनिया फूट-फूट कर रोने लगती है और होरी के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं।
इस प्रकार प्रेमचंद का यह उपन्यास होरी की मृत्यु के साथ समाप्त होता है। 'गोदान' केवल होरी और धनिया की व्यक्तिगत कहानी नहीं है, बल्कि यह तत्कालीन भारत के करोड़ों मूक और असहाय किसानों की वास्तविक सामूहिक गाथा है। प्रेमचंद ने बहुत ही सरल, स्पष्ट और मर्मस्पर्शी वाक्यों के माध्यम से यह दिखाया है कि किस प्रकार सामाजिक कुरीतियां, कर्ज का चक्र, धार्मिक पाखंड और जमींदारी व्यवस्था मिलकर एक सच्चे, ईमानदार और मेहनती इंसान का जीवन पूरी तरह नष्ट कर देते हैं। होरी का चरित्र पूरी दुनिया के साहित्य में शोषित किसान वर्ग का एक अमर और कालजयी प्रतीक बन गया है। यह उपन्यास समाज को उसकी क्रूरता का आईना दिखाता है और पाठकों के दिलों में एक गहरी संवेदना छोड़ जाता है।
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