Kafan (Hindi)
Paperback
• 144 Pages
• ₹ 125.00
• Hindi
• 9789388304085
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| Publisher | Maple Press |
|---|---|
| ISBN13 | 9789388304085 |
| ASIN/SKU | 938830408X |
| Book Format | Paperback |
| Language | Hindi |
| Pages | 144 |
| List Price | ₹ 125.00 |
| Book Code | BD00054863 |
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Discover Kafan (Hindi) by Premchand. This book is published by Maple Press in Paperback format, ISBN 9789388304085, ASIN 938830408X, under Literature and Fiction, Indian Writing, Hindi Literature.
Book Description
'कफ़न' मुंशी प्रेमचंद की अंतिम और सबसे चर्चित कहानियों में से एक है, जो 1936 में प्रकाशित हुई थी। यह कहानी उनके शुरुआती आदर्शवाद की सीमाओं को तोड़कर 'आलोचनात्मक यथार्थवाद' (Critical Realism) की चरम परिणति को दर्शाती है। यह भूख, भयंकर गरीबी और सामाजिक व्यवस्था की क्रूरता के कारण नष्ट हो चुकी मानवीय संवेदनाओं का नग्न और झकझोर देने वाला चित्रण है।
मुख्य पात्र
घीसू: साठ साल का एक बेहद आलसी और कामचोर बूढ़ा, जिसे काम करने से अधिक आराम करना पसंद है।
माधव: घीसू का जवान बेटा, जो अपने पिता के ही पदचिह्नों पर चलता है और स्वभाव से उतना ही कामचोर है।
बुधिया: माधव की पत्नी, जो घर का सारा काम करती थी और उसी की बदौलत इन दोनों को कभी-कभार भरपेट भोजन मिल जाता था।
कथानक
कहानी की शुरुआत सर्दियों की एक रात से होती है। झोपड़ी के अंदर माधव की पत्नी बुधिया प्रसव-पीड़ा से तड़प रही है। उसके कराहने की हृदयविदारक आवाज़ें आ रही हैं। लेकिन झोपड़ी के बाहर अलाव के पास बैठे घीसू और माधव इस बात से बेपरवाह होकर अलाव में भुने हुए आलू निकाल-निकाल कर खा रहे हैं। वे दोनों इतने आलसी और संवेदनहीन हो चुके हैं कि कोई भी अंदर जाकर बुधिया की सुध नहीं लेना चाहता। दोनों को डर है कि यदि एक अंदर गया, तो दूसरा ज़्यादा आलू खा जाएगा। इसी स्वार्थ और अमानवीयता के बीच बुधिया रात भर तड़प-तड़प कर दम तोड़ देती है।
अगली सुबह बुधिया को मृत देखकर दोनों रोने-पीटने का नाटक करते हैं। चूँकि उनके पास कफ़न और अंतिम संस्कार के लिए एक भी पैसा नहीं था, इसलिए वे गाँव के ज़मींदार के पास जाते हैं। ज़मींदार उन दोनों से नफ़रत करता है, फिर भी मजबूरी में दो रुपये दे देता है। इसी तरह गाँव के अन्य लोगों के सामने अपनी दीनता का रोना रोकर वे पाँच रुपये इकट्ठा कर लेते हैं।
कफ़न खरीदने के लिए घीसू और माधव बाज़ार जाते हैं। वे कपड़ों की दुकानों पर घूमते हैं, लेकिन उन्हें कोई भी कफ़न पसंद नहीं आता। असल में उनकी नीयत बदल जाती है। बाज़ार में घूमते-घूमते वे अनजाने में ही एक शराबखाने (मधुशाला) के सामने पहुँच जाते हैं। जीवन भर भूख और गरीबी की मार झेले ये दोनों पात्र कफ़न के पैसों से शराब और बढ़िया भोजन (पूड़ियाँ, कचौड़ियाँ, भुनी हुई मछलियाँ) खरीदते हैं।
अंत की विडंबना
शराब के नशे में चूर होकर वे अपनी क्रूरता को अजीबोगरीब तर्कों से सही ठहराते हैं। वे कहते हैं कि जो कफ़न चिता की आग में जलकर राख हो जाएगा, उस पर पैसे बर्बाद करने का क्या फायदा? माधव कहता है, "कैसी अच्छी थी बेचारी, मरी भी तो हमें खूब खिला-पिलाकर!" पेट भर खाने के बाद वे अपनी बची हुई पूड़ियाँ एक भिखारी को दान कर देते हैं और ऐसा महसूस करते हैं जैसे उन्होंने बहुत बड़ा पुण्य कमा लिया हो। अंत में दोनों नशे में धुत होकर गाते-नाचते वहीं गिर पड़ते हैं, जबकि बुधिया की लाश घर में पड़ी उनके कफ़न लाने का इंतज़ार करती रहती है।
कहानी का मूल स्वर और संदेश
'कफ़न' केवल दो कामचोरों की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस शोषक समाज पर एक करारा व्यंग्य है जहाँ एक व्यक्ति को जीते-जी तन ढकने को चीथड़ा नहीं मिलता, लेकिन मरने के बाद समाज की नाक बचाने के लिए नया 'कफ़न' ज़रूरी हो जाता है। प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से यह कड़वा सच दिखाया है कि जब भुखमरी और अभाव अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाते हैं, तो इंसान के अंदर के सारे रिश्ते, नैतिकता और संवेदनाएँ मर जाती हैं। ऐसे में इंसान की सबसे बड़ी और एकमात्र सच्चाई उसकी 'भूख' बन जाती है।
मुख्य पात्र
घीसू: साठ साल का एक बेहद आलसी और कामचोर बूढ़ा, जिसे काम करने से अधिक आराम करना पसंद है।
माधव: घीसू का जवान बेटा, जो अपने पिता के ही पदचिह्नों पर चलता है और स्वभाव से उतना ही कामचोर है।
बुधिया: माधव की पत्नी, जो घर का सारा काम करती थी और उसी की बदौलत इन दोनों को कभी-कभार भरपेट भोजन मिल जाता था।
कथानक
कहानी की शुरुआत सर्दियों की एक रात से होती है। झोपड़ी के अंदर माधव की पत्नी बुधिया प्रसव-पीड़ा से तड़प रही है। उसके कराहने की हृदयविदारक आवाज़ें आ रही हैं। लेकिन झोपड़ी के बाहर अलाव के पास बैठे घीसू और माधव इस बात से बेपरवाह होकर अलाव में भुने हुए आलू निकाल-निकाल कर खा रहे हैं। वे दोनों इतने आलसी और संवेदनहीन हो चुके हैं कि कोई भी अंदर जाकर बुधिया की सुध नहीं लेना चाहता। दोनों को डर है कि यदि एक अंदर गया, तो दूसरा ज़्यादा आलू खा जाएगा। इसी स्वार्थ और अमानवीयता के बीच बुधिया रात भर तड़प-तड़प कर दम तोड़ देती है।
अगली सुबह बुधिया को मृत देखकर दोनों रोने-पीटने का नाटक करते हैं। चूँकि उनके पास कफ़न और अंतिम संस्कार के लिए एक भी पैसा नहीं था, इसलिए वे गाँव के ज़मींदार के पास जाते हैं। ज़मींदार उन दोनों से नफ़रत करता है, फिर भी मजबूरी में दो रुपये दे देता है। इसी तरह गाँव के अन्य लोगों के सामने अपनी दीनता का रोना रोकर वे पाँच रुपये इकट्ठा कर लेते हैं।
कफ़न खरीदने के लिए घीसू और माधव बाज़ार जाते हैं। वे कपड़ों की दुकानों पर घूमते हैं, लेकिन उन्हें कोई भी कफ़न पसंद नहीं आता। असल में उनकी नीयत बदल जाती है। बाज़ार में घूमते-घूमते वे अनजाने में ही एक शराबखाने (मधुशाला) के सामने पहुँच जाते हैं। जीवन भर भूख और गरीबी की मार झेले ये दोनों पात्र कफ़न के पैसों से शराब और बढ़िया भोजन (पूड़ियाँ, कचौड़ियाँ, भुनी हुई मछलियाँ) खरीदते हैं।
अंत की विडंबना
शराब के नशे में चूर होकर वे अपनी क्रूरता को अजीबोगरीब तर्कों से सही ठहराते हैं। वे कहते हैं कि जो कफ़न चिता की आग में जलकर राख हो जाएगा, उस पर पैसे बर्बाद करने का क्या फायदा? माधव कहता है, "कैसी अच्छी थी बेचारी, मरी भी तो हमें खूब खिला-पिलाकर!" पेट भर खाने के बाद वे अपनी बची हुई पूड़ियाँ एक भिखारी को दान कर देते हैं और ऐसा महसूस करते हैं जैसे उन्होंने बहुत बड़ा पुण्य कमा लिया हो। अंत में दोनों नशे में धुत होकर गाते-नाचते वहीं गिर पड़ते हैं, जबकि बुधिया की लाश घर में पड़ी उनके कफ़न लाने का इंतज़ार करती रहती है।
कहानी का मूल स्वर और संदेश
'कफ़न' केवल दो कामचोरों की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस शोषक समाज पर एक करारा व्यंग्य है जहाँ एक व्यक्ति को जीते-जी तन ढकने को चीथड़ा नहीं मिलता, लेकिन मरने के बाद समाज की नाक बचाने के लिए नया 'कफ़न' ज़रूरी हो जाता है। प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से यह कड़वा सच दिखाया है कि जब भुखमरी और अभाव अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाते हैं, तो इंसान के अंदर के सारे रिश्ते, नैतिकता और संवेदनाएँ मर जाती हैं। ऐसे में इंसान की सबसे बड़ी और एकमात्र सच्चाई उसकी 'भूख' बन जाती है।
Author Biography
मुंशी प्रेमचंद को हिंदी साहित्य का 'उपन्यास सम्राट' कहा जाता है। उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी के निकट लमही नामक गाँव में हुआ था। प्रेमचंद का असली नाम 'धनपत राय श्रीवास्तव' था। उनका बचपन काफी संघर्षपूर्ण रहा; बहुत छोटी उम्र में ही उन्होंने अपनी माता और फिर पिता को खो दिया था। जीवन की इन तमाम कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और बाद में शिक्षा विभाग में एक शिक्षक के रूप में काम करना शुरू किया।
प्रेमचंद ने अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत उर्दू भाषा से की थी, जहाँ वे 'नवाब राय' के नाम से लिखते थे। ब्रिटिश सरकार द्वारा उनकी पहली कहानी संग्रह 'सोजे-वतन' को जब्त किए जाने के बाद, वे हिंदी में लिखने लगे और अपना नाम बदलकर 'प्रेमचंद' रख लिया। उनकी कहानियों और उपन्यासों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी यथार्थवादिता है। प्रेमचंद ने कल्पना की दुनिया से बाहर निकलकर आम आदमी, गरीब किसानों, मजदूरों और समाज के शोषित वर्गों की वास्तविक समस्याओं को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। उन्होंने अपनी कलम के माध्यम से गरीबी, जमींदारी प्रथा, छुआछूत और भ्रष्टाचार जैसी सामाजिक बुराइयों पर गहरी चोट की।
प्रेमचंद ने अपने जीवनकाल में 15 उपन्यास और लगभग 300 से अधिक कहानियाँ लिखीं, जिन्हें 'मानसरोवर' के कई भागों में संकलित किया गया है। उनके प्रमुख उपन्यासों में 'गोदान', 'गबन', 'कर्मभूमि', 'रंगभूमि' और 'निर्मला' शामिल हैं। वहीं कहानियों में 'ईदगाह', 'कफन', 'नमक का दरोगा', 'पंच परमेश्वर' और 'पूस की रात' आज भी लोगों के दिलों में बसी हैं। 'गोदान' को हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में से एक माना जाता है।
8 अक्टूबर 1936 को बीमारी के कारण मुंशी प्रेमचंद का निधन हो गया। उनका अपना जीवन भले ही आर्थिक तंगी और संघर्षों में बीता, लेकिन उन्होंने हिंदी और उर्दू साहित्य को जो अनमोल खजाना दिया, वह बेमिसाल है। प्रेमचंद की सरल, सहज और आम बोलचाल की भाषा ने उन्हें हमेशा के लिए जनमानस का सबसे प्रिय लेखक बना दिया है। उनकी रचनाएं आज के समाज में भी पूरी तरह से प्रासंगिक हैं।
प्रेमचंद ने अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत उर्दू भाषा से की थी, जहाँ वे 'नवाब राय' के नाम से लिखते थे। ब्रिटिश सरकार द्वारा उनकी पहली कहानी संग्रह 'सोजे-वतन' को जब्त किए जाने के बाद, वे हिंदी में लिखने लगे और अपना नाम बदलकर 'प्रेमचंद' रख लिया। उनकी कहानियों और उपन्यासों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी यथार्थवादिता है। प्रेमचंद ने कल्पना की दुनिया से बाहर निकलकर आम आदमी, गरीब किसानों, मजदूरों और समाज के शोषित वर्गों की वास्तविक समस्याओं को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। उन्होंने अपनी कलम के माध्यम से गरीबी, जमींदारी प्रथा, छुआछूत और भ्रष्टाचार जैसी सामाजिक बुराइयों पर गहरी चोट की।
प्रेमचंद ने अपने जीवनकाल में 15 उपन्यास और लगभग 300 से अधिक कहानियाँ लिखीं, जिन्हें 'मानसरोवर' के कई भागों में संकलित किया गया है। उनके प्रमुख उपन्यासों में 'गोदान', 'गबन', 'कर्मभूमि', 'रंगभूमि' और 'निर्मला' शामिल हैं। वहीं कहानियों में 'ईदगाह', 'कफन', 'नमक का दरोगा', 'पंच परमेश्वर' और 'पूस की रात' आज भी लोगों के दिलों में बसी हैं। 'गोदान' को हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में से एक माना जाता है।
8 अक्टूबर 1936 को बीमारी के कारण मुंशी प्रेमचंद का निधन हो गया। उनका अपना जीवन भले ही आर्थिक तंगी और संघर्षों में बीता, लेकिन उन्होंने हिंदी और उर्दू साहित्य को जो अनमोल खजाना दिया, वह बेमिसाल है। प्रेमचंद की सरल, सहज और आम बोलचाल की भाषा ने उन्हें हमेशा के लिए जनमानस का सबसे प्रिय लेखक बना दिया है। उनकी रचनाएं आज के समाज में भी पूरी तरह से प्रासंगिक हैं।
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